जानें : किस वनस्पति में है पत्थरों को तोड़ने का गुण

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पर्वतीय क्षेत्रों में कई ऐसी वनौषधियों की भरमार है जिनमें कुछ के नाम से उसके गुण कर्मों को जाना जा सकता हैI ऐसी ही एक वनस्पति जिसे स्थानीय भाषा में सिलफोड या पाषाणभेद के नाम से जाना जाता है I नाम से ही स्पष्ट है कि इस वनस्पति में पत्थरों को तोड़ देने के गुण मौजूद हैं I लेटीन में ‘बरजीनीया सिलाटा’ के नाम से जानी जाने वाली यह वनस्पति बडे ही औषधीय गुणों से भरपूर है I इसकी चौड़ी पत्तियों में दोनों ही और से रोयें होते हैं I सर्दियों में इसके पत्ते हरियाली लिए हुए होते हैं, लेकिन अत्यधिक ठण्ड पड़ने पर ये हल्के लाल रंग के हो जाते हैं Iइसकी पत्तियों के इस विशेष आकार के कारण ही इसे ‘एलीफेन्ट्स-ईयर’ भी कहते हैं I ये हिमालयी क्षेत्र में 900 से 3000 मीटर की उंचाई पर पाए जाते हैं I स्थानीय लोग इस वनस्पति के बारे में सदियों से इस बात को जानते है कि जहां यह वनस्पति लगेगी वहाँ की चट्टानें टूटी हुई होगी I इस वनस्पति का मुख्या कार्यकारी तत्व बर्गेनिन होता है I हिमालयी क्षेत्र में लोग घरेलू उपचार के तौर पर इसकी पत्तियों का काढा बनाकर बुखार को ठीक कर लेते हैं ,लेकिन इसका सबसे चमत्कारिक प्रभाव मूत्रवह संस्थान पर है I इस वनस्पति का इस्तेमाल आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सा में गुर्दे (किडनी )की पथरी की दवा बनाने में किया जाता है I इसकी पत्तियों में पाए जानेवाले फेनोलिक कंपाउंड के कारण इसके पत्तियों के काढ़े का प्रयोग कैलशीयम फास्फेट एवं केलशीयम ऑक्सेलेट के कारण बनने वाली गुर्दे (किडनी) की पथरी को तोड़कर बाहर निकालने में किया जाता है I स्थानीय वैद्य इसका प्रयोग सदियों से पथरी की चिकित्सा में करते आ रहे हैं I आयुर्वेदिक चिकित्सक भी इस वनौषधि में पाए जानेवाले तिक्त -कषाय एवं भेदन कर्म जैसे गुणों के कारण इसका प्रयोग रुके हुए मूत्र को निकालने में तथा किडनी-स्टोन की चिकित्सा में करते हैं I इसके अलावा इस दुर्लभ वनस्पति का प्रयोग रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाने,शुगर लेवल को कम करने एवं लीवर टानिक के रूप में किया जाता है I इसकी पत्तियों का प्रयोग कमर में होनेवाले दर्द में सिकाई करने हेतु भी प्रयोग किया जाता है I इसके जड़ों से निकाले गए रस का प्रयोग खांसी,जुखाम,दमा एवं दस्त लगने जैसी स्थितियों में दवा के रूप में किया जाता है I

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