देशी आयुर्वेद से ज्ञान ले नोबेल प्राप्त करते विदेशी

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आधुनिक शोध एवं आयुर्वेद के सूत्र: वर्तमान समय मे चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में प्राप्त शोधों पर गौर करें जिन्होंने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है तो आपको ऐसा लगेगा कि कहीं न कहीं इसके तार वैदिक विज्ञान से जुड़ते हैं।वर्ष 2017 के फीजियोलॉजी – मेडिसिन में दिये गए नोबेल पुरस्कार के शोध पर गौर करें तो यह शरीर में एक जीन की खोज को लेकर था जो कि एक प्रोटीन के संश्लेषण के लिये जिम्मेदार था जिससे शरीर की आंतरिक जैविक घड़ी (बायोलॉजिकल क्लॉक ) नियंत्रित होती है।इस शोध में यह बताया गया है कि किस प्रकार एक विशेष प्रकार का प्रोटीन रात में कोशिकाओं में जमा हो जाता है जबकि दिन में यह टूट जाता है यानि पृथ्वी के घूमने से यह शारीरिक जैविक घड़ी नियंत्रित होती है।यानि इससे शरीर का आंतरिक वातावरण :हार्मोन्स का स्तर,शरीर का तापक्रम,नींद एवं चयापचय नियंत्रित होता है।यह शोध इस बात की पुष्टि करता है कि शरीर का आंतरिक वातवरण बाहरी वातावरण से प्रभावित होता है जिसे सदियों पूर्व वैदिक ग्रंथों में *यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे* कह समझाया गया था।आयुर्वेद में शरीर मे दिन एवं रात्रि के अलग प्रहरों में शरीर मे दोषों के अलग अलग प्रभाव का सिद्धान्त रहा है।अब इस वर्ष की एक अमेरिकी शोध जिसे नोबेल प्राइज़ के लिये चुना गया है वह भी बड़ी रोचक है।प्रोफेसर डेविड वाटिंगर (मिशिगन स्टेट यूनिवरसिटी) को तब आश्चर्य हुआ जब उनके एक रोगी के गुर्दे में स्थित पथरी फ्लोरिडा में स्थित डिज्नी वर्ल्ड में एक थंडर माउंटेन रोलर कोस्टर राइड के बाद बाहर निकल गई।इसके बाद उन्होंने पूरे यूरिनरी सिस्टम का एक मॉडल तैयार किया
यह एक प्रकार का सिलिकॉन मॉडल था जिसमे आर्टीफीसीयल किडनी और किडनी स्टोन को एक रोलर कोस्टर राइड (उत्तार चढ़ाव यानि झटके वाली झूले की सवारी) से गुजारा गया तो यह पाया गया कि पथरी छोटे छोटे टुकड़ों के रूप में निकल रही है।
अब इसी शोध को आयुर्वेद के पुरातन ग्रंथ चरक संहिता चिकित्सा स्थान के त्रिमर्मीय चिकित्सा अध्याय 26 में पीत्वाsथ मद्यं निगदेन रथेन हयेन वा शीघ्र जयेन यायात।* तै शर्कराsप्रच्यवते अश्मरी तू शामयेन्न चेच्छल्यविदुद्धरेताम।।*(26) में बताया है कि अश्मरी से पीड़ित रोगी को मद्य पिलाकर तेज चलने वाले घोड़े की सवारी करायें या फिर तेज रथ पर बिठाकर चलाने से (रोलर कोस्टर राइड) से अश्मरी टूट कर बाहर निकल जाती है।
इन दोनों शोध जिनका चयन पिछले दो लगातार वर्षो से नोबेल प्राइज के लिये हुआ है वे आयुर्वेद के सूत्रों में पहले से ही वर्णित है बस फर्क इतना है कि हम इन सूत्रों को बार बार पढ़ते रहे और इनका वैज्ञानिक प्रमाण नही दे पाये और जिन्होंने दिया वो नोबेल प्राइज ले गये।अतः आवश्यकता आयुर्वेद के सूत्रों के रटन्त ज्ञान के गायन कर गधे के पीठ पर चंदन के भार को लादकर महत्व कम करने की नही बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणिकता को दुनिया के सामने सिद्ध करने की है जिसमे हमारे आयुर्वेद के शोध संस्थान अभी तक फिसड्डी ही साबित हुए है।

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