जानें लक्ष्मी प्रिय के औषधीय गुण

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भारतीय परम्पराओं और मान्यताओं के अनुसार हम   वृक्षों, नदियों व पशु-पक्षियों की पूजा करते हैं , जैसे: वृक्षों में पवित्र वृक्ष पीपल, तुलसी, वट, केला और बिल्व को पूजनीय माना गया है, नदियों में  हम गंगा नदी को पवित्र मानते हैं, पशुओं में हम गौ-माता  की पूजा करते हैं। जिस प्रकार तुलसी भगवान विष्णु के साथ जुड़कर पूजनीय बन गई है, इसी प्रकार बिल्व को भगवान शंकर के साथ जोड़ा गया है। तुलसी की तो हम अलग से भी पूजा करते हैं पर बिल्व के वृक्ष की अलग से पूजा नहीं होती है ।  भगवान शंकर की पूजा के लिए  बिल्व को  महत्वपूर्ण पूजन सामग्री के रूप में प्रयोग किया जाता है। नारियल से पहले बिल्व के फल को ‘श्रीफल’ माना जाता है , क्योंकि बिल्व के वृक्ष को लक्ष्मीजी का प्रिय वृक्ष माना  गया है । प्राचीन  काल में भी  बिल्व के फल को लक्ष्मी और सम्पत्ति का प्रतीक मान कर लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने  हेतु   इसकी  आहुति देने का विधान था, जिसका स्थान अब नारियल ने ले लिया है। प्राचीन  काल से ही बिल्व का वृक्ष और इसका फल विशेष रूप से पूजनीय रहा है,  ऐसा माना गया है कि लक्ष्मीजी  एवं शिवजी दोनों  को प्रिय है यह वृक्ष !   बिल्व का फल पूजा के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभप्रद होता है।आयुर्वेद में  बेल की गिरी, रस और बीज को उदर एवं मस्तिष्क  दोनों के लिए लाभकारी  माना गया है। कब्ज से पीड़ित रोगियों  में बेल के फल का गूदा और रस पान करने  के लिए कहा जाता है। बेल का शरबत मन एवं शरीर दोनों को शांति प्रदान करता है इसका प्रयोग कई आयुर्वेदिक दवाओं में भी किया जाता है। बिल्वपत्र का रूप तीन पत्तियों वाला होता है जो देखने में त्रिशूल जैसा दिखाई देता है और त्रिशूल शिवजी का प्रतीकायुध (हथियार ) है। शायद इसलिए त्रिशूल के प्रतीक के रूप में बिल्व पत्र शिवजी की पूजा का अनिवार्य अंग बन गया।

आइये अब हम आपको हिमालयी क्षेत्र में छायांकित किये गए बिल्व के वृक्ष के गुणों की बखान करता एक वीडियो दिखाने जा रहे हैं,जिसे आप इस लिंक पर क्लिक कर लाइव देख सकते हैं !!

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