मैं ब्रह्मकमल हूँ

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ई बार  किसी फूल या जानवर को सरंक्षित करने  हेतु उसे धर्म ,परम्परा ,पूजा -अर्चना से जोड़ दिया जाता है,इसके पीछे एक साफ़ सुथरा कारण उसके अपने गुण एवं  सुन्दरता होती  है। विभिन्न देशों की सरकारों ने अपने यहाँ इसी आधार पर राष्ट्रीय पुष्प ,राष्ट्रीय जानवर आदि घोषित कर रखे हैं, जो देखने में खूबसूरत होते हैं जिससे देश की शान बढ़ती है और एक फक्र की अनुभूति होती है की फलाँ  फूल ,जानवर हमारे देश का राष्ट्रीय पुष्प या जंतु है! कई बार सरकारें राष्ट्रीय दर्जा प्राप्त इन धरोहरों को संरक्षित करने का भी कार्य करती हैं जिससे इनका अस्तित्व खतरे में न पड़ जाय । लेकिन क्या उत्तराखंड राज्य के राजकीय पुष्प‘ब्रह्मकमल’ के साथ कुछ ऐसा हुआ है ? मुझे लगता है नहीं !लेटिन में saussurea obvallata नाम से विख्यात यह सुन्दर पुष्प हिमालयी क्षेत्र की शान के रूप में जाना जाता है I यह फूल 3000 से 4600 मीटर उंचाई पर बर्फीले क्षेत्र में खिलता है I लेकिन पर्यावरण में हो रहे बदलाव ने इसे काफी हद तक प्रभावित किया है I यह फूल रात्री में     चट्टानों के बीच   रुकी हुई बर्फ  वाले स्थान पर कमल की भाँति खिलता है और अगली  सुबह यह मुरझा जाता है I उत्तराखंड में 16 /11 की   भीषण दैवीय आपदा ने हमें काफी सबक दिया है ! क्षेत्र में  बढ़ते  इकोलोजिकल दवाब के कारण इस फूल के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं I मुझे लगता है इसके पीछे एक बड़ा कारण हिमालयी क्षेत्र में हो रहा पर्यावरणीय  परिवर्तन (ग्लोबल वार्मिंग )है I पर्वतीय क्षेत्र में हो रहे जंगलों  के अंधाधुध कटान ने अब ग्लेशियरों को सिकुड़ने पर मजबूर कर दिया है। उच्च हिमालयी क्षेत्र के ऐसे इलाके जहां आज से दस वर्ष पूर्व पर्याप्त मात्रा में चोटियां बर्फ से ढंकी होती थी वे अब अधिकाँश नंगी दिखाई पड़ती हैं I ‘ब्रह्मकमल’ ने भी अब स्वयं अपने अस्तित्व को बचाने के लिए खिसकती बर्फीली चोटियों के  साथ खुद को समेट लिया  है  आज यह 6000 -8000 मीटर की ऊँचाइयों पर बड़ी मुश्किल से मिलता है I हमारी धार्मिक मान्यताओं ने भी कुछ हद तक इसमें अपनी बड़ी भूमिका अदा की है I ‘ब्रह्मकमल’ को केदारनाथ एवं बदरीनाथ धाम में अर्पित करने की परम्परा रही है I इस क्षेत्र के  स्थानीय लोग ‘ब्रह्मकमल’ को  15 -20 रुपये प्रति फूल की दर से तीर्थयात्रियों को बेचते रहे हैं ! लेकिन यह भी एक सत्य है कि पूर्व में स्थानीय जनजातियों  ने इस फूल के औषधीय महत्व को जानते हुए इसे बचाने में परोक्ष रूप से अपनी भूमिका अदा  की थी  I इन जनजातियों में किसी भी फसल को लगाने से पूर्व अपने इष्टदेव  पर औषधीय गुणों से युक्त  ‘ब्रह्मकमल’ चढाने की परम्परा रही है  ,इसी क्रम में वे बुग्यालों से ‘ब्रह्मकमल’ को तोड़कर लाते थे, जिसमें दो से तीन दिन का समय लग जाता था  और इतने समय में पर्याप्त मात्रा में  बीज उत्पन्न हो जाते थे, जिससे पुनः अगले वर्ष उतने ही ‘ब्रह्मकमल’ के फूल खिल जाते थे ,लेकिन  आज इसके उलट उनके बीच भी अधिक से अधिक ‘ब्रह्मकमल’तोड़ने की होड़ पैदा हो गयी है, जिससे पर्याप्त मात्रा में बीज उत्पन्न न हो पाने के कारण  इस फूल की संख्या में लगातार कमी आती जा रही है I इस क्षेत्र में धार्मिक और पर्यटन के कारण यात्रियों के  बढ़ते दवाब ने भी इस फूल के साथ ज्यादती करने में कोई कसर नहीं छोडी है और तो और शोध एवं घर में सजावट के तौर पर खरीदकर ले जाने की प्रवृति ने भी इस फूल के अत्यधिक दोहन को बढ़ावा ही  दिया है I चीन के तिब्बत क्षेत्र में इस फूल को बड़ा ही महत्वपूर्ण माना गया है और इसके लगभग 174 फार्मुलेशनस  वहाँ चिकित्सकीय प्रयोग में लाये जाते रहे हैं I चीन में इससे निकाले गए तेल से बनाए गए परफ्यूम्स का प्रयोग सेक्सुअल स्टीमुलेंट के तौर पर किया जाता रहा है I   एक पौराणिक कथा का भी सम्बन्ध इस फूल से है। कहा जाता है कि जब द्रौपदी अलखनंदा नदी में स्नान कर रहीं थीं,तभी अचानक उन्होंने नदी की धारा में बहते हुए एक सुन्दर फूल को देखा जो अचानक ही ओझल हो गया,द्रौपदी ने भीम से इस फूल को लाने का आग्रह किया और भीम ने इस फूल को ढूंढ निकाला ,जिसे  द्रोपदी ने पूजा कर  ईश्वर के चरणों में अर्पित किया, सृष्टि  के रचियता के नाम से जुड़ने के कारण ही इसका नाम‘ब्रह्मकमल’ पडा, जिसे बदरीनाथ धाम में भगवान् विष्णु को अर्पित किया जाता रहा  है I गढ़वाल क्षेत्र में सितम्बर एवं नवम्बर माह में होनेवाली नन्दाष्टमी यात्रा में स्थानीय युवा भी इस फूल को उच्च हिमालयी क्षेत्रों से तोड़कर लाते हैं तथा नंदा माँ के चरणों में अर्पित करते हैं I लेकिन  मेरा सवाल यह है की  इतने महत्वपूर्ण  राजकीय दर्जा प्राप्त पुष्प को संरक्षित करने हेतु क्या सार्थक प्रयास किये गए हैं  ?  अगर नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब यह अद्भुत ‘कस्तूरीकमल’  विलुप्त पुष्प की श्रेणी में  न आ जाय !

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