जीवन की अविरलता का साक्ष्य है नाड़ी स्पंदन

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अंगूठे के मूल के नीचे जो नाड़ी गति करती है वह जीव की साक्षी है। उस नाड़ी के फड़कने से ज्ञात होता है कि प्राणी जीवित है। नाड़ी-परीक्षा का स्रोत आयुर्वेद है। एलोपैथिक व यूनानी चिकित्सा विज्ञान भी नाड़ी परीक्षा को अपनाता है। वहाँ भी नाड़ी-स्पंदन के आधार पर ही चिकित्सा प्रारंभ करने अथवा न करने का निर्णय लिया जाता है। इस परीक्षा से रोगों की चिकित्सा करने में सुविधा होती है। नाड़ी की गति से ही रोगी में वात, पित्त, कफ तथा सन्निपात एवं साध्य व असाध्य रोग तथा रोगी के सुख-दु:ख का ज्ञान होता है। स्नायु, धमनी, हंसी, धरणी, धरा, तन्तुकी, शिरा तथा जीवितज्ञा, ये सभी नाड़ी के अन्य नाम हैं। नाड़ी की भाषा समझने के लिए व्यापक अध्ययन, अनुभव और गुरु-शिष्य परंपरा के पालन की आवश्यक पड़ती है। आयुर्वेद जो अथर्ववेद का उपाङ्ग है। हमारे देश में आज भी जब कोई रोगी चिकित्सक के पास आता है तो सर्वप्रथम वह उसके हाथ अथवा पैर की नाड़ी की गति का ज्ञान करता है। दुर्घटना की स्थिति में वह नाड़ी के द्वारा ही व्यक्ति के जीवित अथवा मृत होने का निर्णय और तद्नुसार चिकित्सा प्रारंभ करता है।
चिकित्सक अनुभव के आधार पर नाड़ी परीक्षण द्वारा अनेक बातें जान लेते हैं। रोग के साध्य, असाध्य एवं दशा, रोगों का लक्षण एवं रोगी की मृत्यु का समय जानना भी आसान हो जाता है। परंतु यह कह देना जितना सरल है, करके दिखाना उतना ही कठिन भी है। नाड़ी परीक्षाा के लिए अनुभव और अभ्यास की आवश्यकता होती है।
मनुष्य के शरीर में साढ़े तीन करोड़ मोटी तथा पतली नाड़ियाँ होती हैं। इन में से केवल एक ही नाड़ी परीक्षण करने के योग्य है जो दाहिने हाथ तथा पैर में पैâली हुई है। कभी-कभी मरणासन्न अवस्था में हाथ की नाड़ी फड़कती हुई नहीं जान पड़ती है। उस समय पैर, शिश्न, नाक, कण्ठ आदि स्थानों की नाड़ी देखकर जीवन का ज्ञान किया जाता है।
नाड़ी परीक्षण के लिये प्रात:काल में मल-मूत्रादि नित्य क्रिया से निवृत्त होकर आराम से सुखपूर्वक बैठे हुए रोगी के नाड़ी की परीक्षा की जाती है। प्रात:काल नाड़ी देखने की परम्परा समान्य है। रोगी की तीव्रावस्था में अथवा आवश्यकतानुसार किसी भी समय नाड़ी परीक्षण किया जा सकता है। रात्रि में विश्राम के उपरान्त नाड़ी स्वत: ही अपनी प्राकृतिक दशा में आ जाती है। उस समय नाड़ी परीक्षण करने से रोग का निर्णय करने में आसानी होती है। दोपहर तथा शाम को दिन की परेशानियों के कारण नाड़ी की गति चंचल होती है। स्नान तथा भोजन करने के तुरन्त बाद, भूख-प्यास की अवस्था में, धूप में घूमने और व्यायाम करने के बाद नाड़ी का ज्ञान अच्छी तरह नहीं होता है। तेल मालिश करने के बाद, सोते समय, भोजन करते समय तथा भोजन करने के बाद नाड़ी का ज्ञान अच्छी तरह से नहीं होता क्योंकि इन समयों में नाड़ी स्वाभाविक गति छोड़कर विकृत गति धारण कर लेती है।
नाड़ी परीक्षण के लिये चिकित्सक द्वारा बायें हाथ से रोगी के कोहनी के अंदर के भाग को मर्दन कर अपने दाहिने हाथ की तीन अंगुलियों (तर्जन, मध्यमा व अनामिका) से रोगी के अंगूठे के मूल के नीचे (एक अँगूठा छोड़कर) मध्य भाग में वायु के साथ गति करने वाली नाड़ी की निरंतर परीक्षा और उसे वात, पित्त, कफ तथा सन्निपात की गति का बोध करना चाहिए। मर्दन करने से नाड़ियाँ स्पष्ट हो जाती हैं। अपनी तीनों अंगुलियों से दबा-दबाकर नाड़ी की गति का अनुभव करना चाहिए। नाड़ी परीक्षण हेतु पुरुषों के दाहिने हाथ तथा स्त्रियों के बायें हाथ का उपयोग करने का विधान है।
आयुर्वेद के अनुसार वात, पित्त और कफ तीन प्रकार के दोष शरीर में सदैव स्थित रहते हैं। तीन अंगुलियों से त्रिदोष अर्थात् वात, पित्त और कफ के संतुलन का परीक्षण किया जाता है। इनका संतुलन बिगड़ने से शरीर में रोग पैदा हो जाते हैंं। नाड़ी ज्ञान के लिए अँगूठे के नीचे एक अंगुल छोड़कर नाड़ी पर अंगुलियों को रखा जाता है। पहले वात नाड़ी, मध्य में पित्त नाड़ी और अंत में कफ नाड़ी चलती है। वात के चंचल और गतिमान होने से पहले वात नाड़ी फड़कती है, पित्त नाड़ी के उष्ण और चपल होने से मध्य में फड़कती है तथा कफ नाड़ी शीतल एवं मंद होने से अंत में मालूम पड़ती है। अर्थात् नाड़ी स्वभाव से ही तर्जनी के नीचे वात नाड़ी, मध्यमा के नीचे पित्त नाड़ी तथा अनामिका के नीचे कफ नाड़ी चलती है। शरीर में स्थित वात, पित्त और कफ के संतुलन से स्वास्थ्य बना रहता है। वात के कारण शरीर में गति बनी रहती है, रक्त का संचार बना रहता है, श्वाँस-प्रश्वाँस और भोज्य पदार्थों की गति इसी से बनी रहती है। पित्त के कारण पाचन और कफ के कारण शरीर की स्निग्धता बनी रहती है।
स्वस्थ व्यक्ति की निर्दोष नाड़ी वेंâचुए तथा साँप की तरह स्थिर व धीर गति से चलती है और बलवान होती है। स्वस्थ एवं रोगरहित व्यक्ति की नाड़ी प्रात:काल स्निग्ध (चिकनी एवं मंद गति) चलती है। दोपहर को उष्णता से युक्त तथा शाम को चंचल गति से चलती है। इस प्रकार की गति उन व्यक्तियों में होती है जो अधिक दिनों से निरोग होते हैं। प्रात:काल कफ का प्रकोप, दोपहर को पित्त का प्रकोप तथा सायंकाल वात का प्रकोप सामान्यत: होता है। वात रोगों में नाड़ी वायु के प्रकोप से साँप तथा जोंक की भाँति टेढ़ी-मेढ़ी चलती है। पित्त के प्रकोप से कौवा तथा मेंढक की गति सदृश चंचल गति से पुâदक-पुâदक कर चलती है और कफ के प्रकोप से नाड़ी राजहंस, मयूर तथा मुर्गी की गति की तरह गंभीर, धीर और अंदर की ओर घुसती हुई चलती है।
जिस रोगी का शरीर पुराने रोग के कारण क्षीण हो जाय और उसकी नाड़ी पतली होते हुए वेंâचुए की तरह चिकनी, धीर तथा वक्र गति से मोटी हो, साँप की तरह कठिन, मोटी, तेज तथा वक्र गति से चलती हुई, क्षीण (सूक्ष्म) या अदृश्य हो जाय तो उस दिन से एक महीने के अंत में रोगी की मृत्यु निश्चित समझनी चाहिए। यदि रोगी की नाड़ी कुछ समय जोर से चले विंâतु शीघ्र ही शान्त हो जाय अर्थात् नाड़ी की गति मालूम न पड़े और रोगी के शरीर में सूजन न हो तो रोगी की मृत्यु सातवें दिन हो जाती है ऐसा समझना चाहिए। यदि ज्वर के दाह से व्याकुल त्रिदोष के लक्षण वाले रोगी की नाड़ी शीतल होते हुए साफ मालूम पड़े तो उसकी मृत्यु तीन दिन में हो जाती है। असाध्य रोगी की नाड़ी दाहिने हाथ में ही देखते हैं और विशेषकर पैर में भी देखते हैं। यदि दोनों की नाड़ी एक समान हो अर्थात् दोनों की नाड़ी तर्जनी के नीचे ही हमेशा चलती हो अथवा श्वाँस मुख से चलती हो, नाक से नहीं, तो रोगी की मृत्यु चार दिन में हो जाती है। यदि रोगी की नाड़ी भ्रमर की तरह दो तीन बार फड़क कर गायब हो जाय और पुन: थोड़ी देर में उसी प्रकार चले तो उसकी मृत्यु एक ही दिन में हो जाती है। यदि नाड़ी अंगूठे की जड़ में प्राय: न फड़के और कभी-कभी अंगूठे के नीचे तर्जनी अंगुली में स्पर्श करे तो समझना चाहिए कि रोगी की मृत्यु बारह घंटे के अंदर ही हो जायेगीr। जिसकी नाड़ी रह-रह कर अंगूठे के मूल में तर्जनी के नीचे बिजली की झलक की तरह जल्दी से फड़क जाय तो वह एक दिन जीवित रहता है, दूसरे दिन अवश्य ही मर जाता है। यदि नाड़ी अनामिका के नीचे स्पंदन करे तो समझना चाहिए कि रोगी की मृत्यु आधे घंटे के बाद हो जायेगी।
जिस रोगी का एक नेत्र भयंकर हो जाय तथा दूसरा नेत्र बंद रहे वह रोगी तीन दिन में और जिस रोगी का नेत्र सहसा ज्योतिरहित हो जाय और थोड़ा रक्तवर्ण का रहे तो उसकी मृत्यु शीघ्र ही हो जाती है। जब रोगी रक्त वर्ण का, कृष्ण वर्ण का और भयंकर देखता है तब भी रोगी की मृत्यु में कोई संदेह नहीं होता है। यदि एक दृष्टि अचेतन हो गयी हो और घूमता हुआ तथा फरकता हुआ तारकमण्डल दिखायी देता हो तो रोगी एक दिन में अवश्य ही परलोक चला जाता है।
जो मनुष्य मेघाछन्न दिशा, वर्षता हुआ मेघ, पूर्ण चन्द्रमा तथा सूर्य को पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर दिशा में न रहते हुए भी देखता है तो यदि वह पूर्व दिशा में देखे तो छ: माह, दक्षिण दिशा में देखे तो तीन माह, पश्चिम दिशा में देखे तो दो माह और उत्तर दिशा में देखे तो एक माह तक उसकी आयु होती है। अर्थात् अभ्रदर्शी छ: माह में, वर्षादर्शी तीन माह में, पूर्ण चन्द्रदर्शी दो माह में तथा सूर्यदर्शी एक माह में मर जाता है। यदि चारों तरफ छिद्र देखे तो दस दिन में, चारों तरफ धॅुंआ सा दिखे तो पाँच दिन में तथा ज्वाला देखे तो सद्य: मृत्यु हो जाती है, ऐसा उचित काल जानने वालों का मानना है।
जो मनुष्य जिह्वा का अग्र भाग, नासिका का अग्रभाग, भौहों का मध्य भाग और दोनों भौहों को नहीं देख पाता और कर्णघोष (कानों को अंगुली से बंद करने पर जो शब्द होता है उसे कर्णघोष कहते हैं) नहीं समझ पाता है, उसकी आयु क्षीण होती है। जो व्यक्ति भौहों को नहीं देखता वह नव दिन, नेत्र दिखायी न पड़े तो पाँच दिन, कान से कर्णघोष न सुने तो सात दिन, नासिका दिखाई न पड़े तो तीन दिन, जिह्वा दिखायी न पड़े तो एक दिन में मृत्यु हो जाना समझना चाहिये। कोई व्यक्ति अकस्मात् मोटा हो जाय और अकस्मात पतला हो जाय तथा अकस्मात अन्य प्रकार का हो जाय तो उसकी आयु छ: माह तक समझनी चाहिए। हिम के समान शीतल शरीर वाले व्यक्ति के ललाट पर पसीना हो, शीतलता पीड़ित होने पर भी शरीर में स्निग्धता हो तथा अन्न व पेय कण्ठ में हीं रह जाय, वक्ष तक न पहुँचे तो वह मनुष्य अवश्य ही मृत्यु को प्राप्त होता है। जिस रोगी को रात्रि में दाह संतप्त करता हो तथा दिन में शीतलता से कष्ट होता हो, कण्ठ में कफ भरा हो, मुख स्वादरहित हो, नेत्र वुंâकुम के समान हो, जिह्वा काली हो तथा नाड़ी हमेशा धीरे-से-धीरे चलती हो तो उस रोगी की औषध राम-राम का स्मरण मात्र ही होता है।
मृत्यु के समय मनुष्य का ओष्ठ सूख जाता है और काला हो जाता है तथा दाँत व नाखून भी काले पड़ जाते हैं। नाक का क्षेत्र शीतल हो जाता है, आँखें लाल हो जाती हैं, एक आँख के देखने की शक्ति नष्ट हो जाती है, हाथ पैर शिथिल होकर अकर्मण्य हो जाते हैं, कान झुक जाते हैं, श्ीात या उष्ण श्वाँस-प्रश्वाँस होने लगता है तथा उâध्र्व श्वाँस हो जाता है, शरीर ठंडा हो जाता है और कँपकपी होने लगती है, मनुष्य सर्वथा उद्वेग से युक्त या प्रपंचरहित शून्य एवं शांत हो जाता है।
जब मनुष्य की संपूर्ण नाड़ियाँ शांत हो जाती हैं और इंद्रियों का कार्यकलाप भी शांत हो जाता है या सूक्ष्म रूप से उन सबों का व्यापार रह जाता है अथवा थोड़ी उष्णता रूप विकार आ जाने पर या सर्वथा शरीर शीतल हो जाने पर, चित्त और आत्मा का मार्ग शून्य हो जाने पर या स्पंदन शून्य हो जाने पर, नि:संज्ञ हो जाने पर या दाहिने नासिका से श्वाँस लेना बंद होकर केवल बायाँ श्वाँस चलने पर, जब ये सब लक्षण दिखलाई पड़ने लगे तब उस व्यक्ति की मृत्यु हो रही है, ऐसा समझना चाहिए। इसके अलावा नाड़ी विकृत अथवा सूक्ष्म हो जाय, शरीर की कान्ति चली जाय, वायु प्राणवह मार्ग को छोड़कर विपरीत भाव में चली जाय और ज्ञान भी शून्य हो जाय तथा इन्द्रियों के अपने-अपने कार्यकलाप शांत हो जाये और दायाँ व बायाँ नासिका से श्वाँस के बंद हो जाने पर मनुष्य की मृत्यु स्पष्ट हो जाती है।

लेखक : डॉ० दया शंकर त्रिपाठी
बी २/६३ सी-१के, भदैनी
वाराणसी – २२१ ००१.
मो०- ९४१५९९२२०३

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