पिडीच्छिल धारा: केरल में प्रचलित पंचकर्म

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युर्वेदिक चिकित्सा और पंचकर्म चिकित्सा के बारे में लोगों सहित चिकित्सकों को जागरूक करने के उद्देश्य से मैंने ये सीरीज प्रारम्भ की जिसका काफी सकारात्मक  प्रतिक्रियायें मुझे लगातार मिल रही  है।कहते है कि मृग जंगल जंगल कस्तूरी की खोज में भटकता है और उसे ये मालूम ही नही होता कि कस्तूरी तो उसकी नाभि में ही है।शायद आज कुछ ऐसा ही हाल हमारे आयुर्वेद के  चिकित्सकों का भी है।मेरे इन लेखों को पढ़ यदि चिकित्सकों में पंचकर्म चिकित्सा के प्रति रूचि पैदा हो रही है तो मैं अपने मकसद को कामयाब मानूँगा ।
पंचकर्म चिकित्सा के अंतर्गत आनेवाली कुछ विधियां जो केरल के चिकित्सकों द्वारा प्रचलन में प्रयोग की जाती है नाम है “पीडिच्छिल धारा”

इन विधियों को धारकल्प नामक ग्रन्थ के मूल पाठ से लिया गया है।

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आईये जानें कैसे की जाती है पीडिच्छिल धारा:-

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13339634_10206321741550627_5832794401710120898_n.jpg*इसके लिए एक ऐसी द्रोणी चाहिए जिसमे से गिरे हुए तेल को इकठ्ठा किया जा सके
**चंदनबला लाक्षादि तेल या महानारायण तेल या महामाष तेल या दशमूलादि तेल या धांवन्तर तेल कोई भी रोगी के रोग अनुसार लगभग 2 लीटर तेल
***इस विधि को करने के लिए भी आपको 5 पंचकर्म सहायक चाहिये।

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विधि:-रोगी को तेल द्रोणी में बिठा दें।अब सर्वप्रथम रोगी की विधि पूर्वक अभ्यंग (मालिश ) करें।सिर पर आप किसी भी शीतल तेल और शरीर पर सुखोष्ण तेल को इस हेतु आप प्रयोग में ला सकते हैं।इसके बाद पूर्व में षष्टिकशाली स्वेद विधि में बताये अनुसार ‘ आमलकी कल्क से तल धारण’ करा दें। सिर पर रूई का पैड रखकर स्वस्तिक बंधन ऐसे बांधे ताकि तल और रूई का पैड फिक्स हो जाय,इससे रोगी की आँख गिरने वाले तेल से बची रहेगी।इन सबकी जगह आप सिर पर साफ़ कपड़ा बाँध भी इस प्रक्रिया को कर सकते हैं।
ऊपर बतायी गयी काठ की तेल द्रोणी में जिससे तेल नीचे इकट्ठा हो चार पंचकर्म सहायक को रोगी के दायीं और बायीं ओर खड़ा कर दें।और वो ठीक षष्टिकशाली स्वेद में बतायी गयी विधि अनुसार दो कमर से ऊपर दायीं और बायीं ओर तथा दो कमर से नीचे दायीं और बायीं ओर पोजीशन ले लें।
अब 18×18 के कपडे के टूकड़ों को तेल रखे बर्तन में डुबाकर,निचोड़ कर दाहिने हाथ की मदद से अंगूठे के साथ धारा के रूप में शरीर पर गिराएं।
13335647_10206321749470825_7699458456909520694_n.jpgइस हेतु आजकल छोटी छोटी केतली स्टाइल की कुंभीयां भी प्रयोग में लाई जा सकती है।जब सहायक दाहिने हाथ से तेल गिराये तो बाएं हाथ से मृदुअभ्यंग कर तेल को पोछता रहे।धारा का वेग न अधिक हो न कम हो,धारा लगभग 9 इंच की ऊंचाई से गिराई जाय।
तेल उतना ही गर्म हो जितना रोगी सह सके।तेल को एकसमान रूप से पूरी प्रक्रिया के दौरान सहने लायक गर्म होना चाहिये ऐसा न हो कि प्रक्रिया शुरू करते समय तो तेल अच्छा सुखोष्ण था और बाद में ठंडा हो गया।बेहतर यह है कि सहायक बायें हाथ के ऊपर तेल गिराकर देखे कि तेल सहने लायक गर्म है या नहीं!
धारा करने के दौरान जो तेल द्रोणी से नीचे गिरता है वह द्रोणी में पैर के हिस्से में बने छेद से नीचे गिरकर बर्तन में इकठ्ठा हो जाय जिसे पांचवा पंचकर्म सहायक फिर से गर्म कर इन चारों सहायकों को देता रहे।इन सहायकों का धारा गिराने में अनुभवी होना आवश्यक है।

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आप इस विधि को प्रतिदिन भी करा सकते हैं।व्यक्ति व्यक्ति मध्यम मानसिक और शारीरिक अवस्था का हो तो 2 या 3 दिन में एक बार करें।यदि हीन मानसिक और शारीरिक सत्व का हो तो सप्ताह में एक बार करा सकते हैं।

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इस विधि को वातज रोगों में लगभग 2 घंटे,वात कफज रोगों में 1 घंटे तक कराया जा सकता है।सामान्यतय जब पसीना आने लगे तो समय पूरा हुआ समझें और यह औसतन 1 से डेढ़ घंटे तक करायें।आप मालिश की प्रत्येक 7 पोजीशन में 10 से 15 मिनट तक पीडिच्छिल धारा का प्रयोग अवश्य ही करायें।

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*अधिक गर्म अधिक कम ऊंचाई से धारा न गिरायें।
*किसी को उपद्रव उतपन्न हो तो धारा तुरंत बंद कर दें।

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इसी विधि से यदि क्षीर धारा की जा रही हो तो प्रतिदिन फ्रेश दूध लेना चाहिए।
स्नेहधारा में भी जो तेल आप प्रयोग करा रहे हों उसे तीन दिन में बदल दें।
पीडिच्छिल के बाद रोगी को हल्का भोजन देना चाहिये।धारा पश्चात रोगी को थोडा आराम करायें और मृदु अभ्यंग के साथ सुखोष्ण जल से या औषधि सिद्धित काढ़े से स्नान करायें।
परिहार काल 7,14,21 या 28 दिन का होता है जितने दिन धारा करें लगभग उतने ही दिन परिहार करायें।

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नोट:यह केवल पंचकर्म चिकित्सा के चिकित्सकीय ज्ञान हेतु प्रसारित है इस विधि का प्रयोग पंचकर्म एक्सपर्ट एवं प्रशिक्षित सहायक द्वारा ही संपन्न होना चाहिए।अधिक जानकारी या किसी भी शंका निवारण हेतु मुझे ayushdarpan@gmail.com पर मेल करें

 

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