षष्टिकशाली स्वेदन :पंचकर्म की केरलीय विधि

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मैं आपको पंचकर्म चिकित्सा की जानकारी जनसामान्य के हित के लिए देने जा रहा हूँ जिससे चिकित्सक सहित आम जनों को भी इस विशिष्ट चिकित्सा पद्धति का लाभ मिल सके Iकुछ चिकित्सक पंचकर्म को कुछ यूँ प्रचारित करते हैं जैसे केरलीय पंचकर्म,महाराष्ट्रीय पंचकर्म,मध्यप्रदेशीय पंचकर्म,उत्तरप्रदेशीय पंचकर्म जैसे गाँव खेड़े जिले जिले और राज्यों में पंचकर्म ही नही आयुर्वेद बदल रहा हो।लेकिन चिकित्सक बंधुओं आप कन्फ्यूज मत होना पंचकर्म चिकित्सा अग्निवेश कृत तंत्र चरक संहिता में वर्णित मूल विषय ही है।हाँ कुछ समय,परिवेश एवं औषधीयों की उपलब्धता के आधार पर कुछ अच्छी एवं प्रभावी विधियों को रोगियों के कल्याण हेतु हम अवश्य अपनाते रहे हैं।ऐसी ही एक विशिष्ट विधि जो केरलीय चिकित्सकों द्वारा अपनाई जाती रही है नाम है षष्टिकशाली स्वेदन I

जानें कैसे करायी जाती है षष्टिकशाली स्वेदन:-

यह विधि बड़ी ही प्रभावी है आप इसे मायोपैथी,पोलियोमायलाईटीस जैसी स्थितियों में बेशक प्रयोग कराया जा सकता है
मैं आपको संक्षिप्त और सरल शब्दों में यह विधि बता रहा हूँ  I

  निम्न द्रव्य इकट्ठे करने हैं:-

*साठ दिनों में पका चावल यह लाल रंग का होता है आपको बाजार में आसानी से मिल जाएगा।
*बला की जड़ (500ग्राम)
13319696_10206314792936916_6867848890547801582_n.jpg बला की जड़ को छोटे छोटे टुकड़ों में काट लें अच्छी तरह से पानी से धो लें अब 16 गुना पानी में डालकर चौथाई शेष रहने तक खुले बर्तन में उबालें।अब शेष बचे काढ़े के आधे हिस्से में बराबर मात्रा में दूध मिलाकर मिक्स कर लें।अब इस दूध और काढ़े के मिश्रण में 350 ग्राम लगभग लाल साठी चावल मिलाकर अच्छी तरह भात के जैसे पका लें ।जब पक जाय तो चावल को अच्छे प्रकार से घोंट लें ।अब 8 कपडे के टुकड़े (18″x18 “) लें और पके हुये भात को बराबर मात्रा में रखकर 8 पोटलियाँ बना लें।पोटली को इस प्रकार बांधे की ऊपर का भाग चौड़ा हो और आप उसे आसानी से हाथों में पकड़ सकें।अब आपके पास जो काढ़ा आधा बचा था उसमे फिर दूध मिलाकर इंडक्शन या गैस जो भी उपलब्ध हो पर धीमी आंच में पकायें।अब बनायी गयी आठों पोटलियाँ इस में डूबा दें ताकि वे गर्म होती रहें।

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रोगी में इस पिंड स्वेद को करने से पहले सिर पर आमलकी कल्क का तल धारण कराना होता है।इसे आप पहले से ही बनाकर रख लें।
विधि:-250 ग्राम आमलकी चूर्ण और 500 मिली मट्ठा (आपको गाँव में मिल जायेगा)
इनको पका लें जब पककर गाढ़ा हो जाय तो इसको हल्का पीस लें और ठंडा होने के लिये रख दें।

रोगी को द्रोणी हो तो ठीक न हो तो कोई बात नही काठ की टेबल पर ही बिठा दें।पूरे शरीर पर मालिश करने की 7 अलग अलग पोजीशन से करायें।तैल की च्वाइस आपकी है क्षीरबला,शतावरी,लाक्षादि इनमे से किसी भी तेल का आप प्रयोग रोगी और रोगानुसार करा सकते हैं।
लगभग 30 मिनट तक मालिश करें अब जो आपने आमलकी कल्क(पेस्ट) बनाया था उसे सिर के उपर चक्राकार दीवार जैसी बनायें और अंदर चन्दनबला या कोई भी ठंडी प्रकृति 13312734_10206310989921843_6239711400889014305_n.jpgका तेल भर दें और ऊपर से निर्गुन्डी या एरंड का पत्ता रख स्वस्तिक बंधन बाँध दें।बस बंधन की गांठ कान की पट्टी के पास आये।इसे तल धारण कहते हैं ।यह बहुत ही आवश्यक विधि है।

 

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अब रोगी के दोनों ओर दो सहायक खड़े हो एक सहायक काढ़े के मिश्रण जो धीमी आंच पर रखा हो उसके पास खड़ा हो।दो सहायक कमर के ऊपर वाले हिस्से को तथा दो कमर के 13321822_10206310997402030_7104954528404833152_n.jpgनीचे वाले हिस्से पर स्वेदनं करने को प्रशिक्षित एवं तैयार हों।अब पोटली को काढ़े में डुबा डुबा कर दो सहायक गर्दन से नीचे अनुलोम गति से तथा दो सहायक कमर से नीचे अनुलोम गति से स्वेदनं प्रारम्भ करें।जॉइंट्स में सर्कुलर आदि तकनीक का प्रयोग करें।जब पोटलियाँ ठंडी होने लगे तो एक सहायक उसे मिश्रण में गर्म होने के लिये रख दे।ध्यान रहे कि मिश्रण ज्यादा गर्म न हो।यह बात प्रशिक्षित सहायक भली भाँति जानते है।इस प्रकार से स्वेदनं करते समय भी आप मालिश की 7 पोजीशन का प्रयोग करें …बिठाकर,पीठ के बल लिटाकर,बायीं करवट लिटाकर,पेट के बल लिटाकर,दाहिनी करवट लिटाकर,पीठ के बल लिटाकर,पुनः बिठाकर।सभी अवस्थाओं में15 मिनट और कुल लगभग आधे से 1 सवा घंटे तक स्वेदनं करें।
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यह बड़ी ही कामयाब विधि है जिसमे पोटली से बाहर स्वेदनं के दौरान औषधि सिद्ध साठी शरीर को संस्कारित करती है।जब यह क्रिया पूरी हो जाय तो पोटली के अंदर के द्रव्यों को रोगी के शरीर पर फैलाकर उद्वर्तन करें।5से 10 मिनट के बाद शरीर से इस लेप को साफ़ कर दें।
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आप षष्टिकशाली को शरीर से साफ करने के लिये नारियल के पत्ते या एरंडी के पत्ते या कुछ न मिले तो साफ़ कपडे का उपयोग करें ।31871_397557914734_3693317_n.jpg
अब सिर में भरा तेल निकाल कपडे से साफ़ कर लें।इसके बाद रोगी को गुनगुने पानी से स्नान करवा दें।
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यह चिकित्सा प्रतिदिन या एक दिन छोड़ करें।आप इसे रोगी की अवस्था के अनुसार 7 दिन, 9 दिन,11 दिन ,14 दिन 23 दिन या 28 दिन करें।
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चिकित्सा के उपरान्त परिहार विषय का पालन करने का रोगी को निर्देश अवश्य दें।
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नोट :इस विधि को सरल और सुगम्य बनाने तथा चिकित्सकों के समझ में आने के दृष्टिकोण से सरल भाषा का प्रयोग किया गया है।इस विधि का चिकित्सकीय निर्देशन में ही किया जाना चाहिए I

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