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सेहत के लिये वरदान है इस वृक्ष के फूल और छाल

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पर्वतीय क्षेत्रों में पेड़ों पाए सुंदर छटा बिखेरते कोईराल या कवीराल के नाम से प्रचलित वृक्ष के फूल को अक्सर लोग रायता बना कर खाते हैं इस प्रकार के स्थानीय व्यंजनों का सीधा सबंध स्वास्थ्य से जुड़ता है ।जहां पर्वतीय क्षेत्र में मौसम में ठंडक होने के कारण लोग अक्सर गर्म और मसालेदार भोजन लेना पसंद करते हैं जिसके फलस्वरूप कब्ज और एसिडिटी आम तौर पर एक सामान्य लक्षण के रूप में मिलती है ।लेकिन इन्ही समस्याओं से निजात के लिये कोईराल यानि कांचनार जिसे अंग्रेजी में माउंटेन इबोनी कहते हैं जैसे पेड़ भी अपने फूलों के साथ प्रकृति की सुंदरता में चार चांद तो लगाते ही हैं साथ ही पेट का भी ख्याल रखते हैं।आमतौर पर कांचनार की कलियों की सब्जी बनाई जाती है और फूलों का रायता बनाया जाता है यह बड़ा ही स्वादिष्ट होता है।पर स्वाद ही नही यह सेहत के लिये भी फायदेमंद है।आईये जानते हैं इस सुंदर फूलों वाले वृक्ष के गुणों के बारे में। लेटिन में बहुनिया वेरीगेटा के नाम से और संस्कृत में कोविदार के नाम से जानते हैं बड़ी ही महत्वपूर्ण औषधि है।इसके फूलों में मिलने वाले फ्लेवनॉयड ,टेरपेन्टिन ,फिनायल एंथ्रोक्विनोन के कारण ही यह सूजन को कम करनेवाली और लीवर को सुरक्षा देने वाली वनस्पति की श्रेणी में आती है ।आमतौर पर अपने फूलों और खूनी बवासीर से परेशान लोगों में कांचनार की छाल को पीसकर मट्ठे के साथ दो दिन बाद लेना ही बड़ा लाभकारी होता है।इसकी फूल की कलियों को सुबह शाम घी में भूनकर खाने मात्र से आपको भूख लगने लग जाएगी।इसकी छाल का काढ़ा 2 चम्मच की मात्रा में शहद के साथ लेने से दमा और खांसी में लाभ मिलता है। कांचनार के पेड़ की छाल को जलाकर उसकी राख से मंजन बनाया जाता है इसे सुबह शाम दांतों में लगाने से दांत दर्द सहित मसूड़ो की समस्याओं में काफी लाभ मिलता है।थायराइड के मरीजो के लिये इसके फूल बड़े ही काम के होते हैं लीवर में किसी भी प्रकार की तकलीफ होने पर इसकी जड़ के काढ़े को पीने से काफी लाभ मिलता है ।यदि दस्त के साथ खून आ रहा हो तो कांचनार के फूल के काढ़े का सुबह शाम सेवन करना काफी लाभकारी होता है ।
*आईये जानते हैं कैसे करते हैं चिकित्सक इसका प्रयोग*
कांचनार की आयुर्वेद में प्रचलित दवा कांचनार गुगुलु है ।
-इसके छाल का चूर्ण बनाकर 3 से 6 ग्राम की मात्रा में प्रयोग कराया जाता है।
-इसके फूलों का रस 10 से 20 मिली की मात्रा में प्रयोग कराया जाता है ।
-इसकी छाल का काढ़ा 30 से 50 मिली तक प्रयोग कराया जाता है ।उत्तराखंड सहित नेपाल में इस वृक्ष का इतिहास लगभग 3000 वर्ष पुराना है इसके पत्तियों का दो हिस्सों में कटा होना इस वृक्ष को आसानी से पहचानने में मदद करता है।पहाड़ो में सदियों से इसकी लकड़ी का प्रयोग घरों के निर्माण में और पत्तियां पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग में लाई जाती रही है।

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