आयुष दर्पण

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परमपिता परमेश्वर ईश्वर की कृपा सभी प्राणियों पर बनी रहती है ईश्वर ने यदि हमें उत्पत्ति दी तो जीवन को जीने के लिए तरीके भी बताए, यह तरीके आयुर्वेद के रूप में आज हमारे सामने हैं, हम जानते हैं कि शरीर में उत्पन्न पीड़ा का ही दूसरा नाम रोग है ,तो परमपिता परमेश्वर भगवान “शिव” जिन्हें आदि योगी भी कहा जाता है ने रोगों से मुक्ति सहित स्वास्थ्य संरक्षण के लिए भी समस्त मानव जाति को “मर्म चिकित्सा” विद्या के रूप में एक अत्यंत प्रभावी विधा दी।यह विद्या वैदिक चिकित्सा पद्धति के रूप में आयुर्वेद से भी पुरातन चिकित्सा विधा के रूप में प्रयोग की जाती रही थी। शल्य तंत्र के प्रणेता महर्षि सुश्रुत द्वारा स्वरचित ग्रंथ के शारीर स्थान ‘मर्मनिर्देशीय अध्याय’ में मर्मों का विस्तृत वर्णन किया गया है। सुश्रुत के अनुसार मर्म वे बिंदु है जहां मांस-सिरा-स्नायु-अस्थि संधि इन सभी का सन्निपात होता है। महर्षि सुश्रुत के अनुसार एक शल्य चिकित्सक को मर्म स्थानों की जानकारी का होना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने उद्धृत किया है कि जानकारी के अभाव में इन मर्म स्थानों पर आघात से मृत्यु भी हो सकती है।
महर्षि चरक प्रणीत ग्रंथ चरक संहिता के सिद्धि स्थान में त्रिमर्मीय सिद्धि अध्याय में ह्रदय,बस्ति एवं सिर को तीन प्रधान मर्म माना गया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी ह्रदय,मस्तिष्क एवं फुफ्फुस को प्रमुख मर्म स्थान मानता है।
हृदये मूर्ध्नि बस्तौ च नृणा: प्राण प्रतिष्ठिता:।

यानि इन तीनों में प्राणों का निवास होता है।महर्षि सुश्रुत प्रणीत ग्रंथ सुश्रुत संहिता के टीकाकार आचार्य डल्हन ने “मारयन्ति इति मर्माणि” तथा महर्षि वाग्भट्ट प्रणीत ग्रंथ अष्टांग हृदय में मरण कारित्वनमर्म: निरुक्ति दी है ।महर्षि सुश्रुत के अनुसार यंत्र, शस्त्र क्षार एवं अग्नि कर्म करने वाले चिकित्सक को यदि मर्म स्थानों ओ जानकारी सटीक रूप से ना हो तो वह शल्य तंत्र विज्ञ चिकित्सक अनर्थ कर सकता है,इसलिये भी मर्म ज्ञान को आवश्यक बताया है।
उपायं चिन्तयन प्राज्ञ: अपायंमपि चिन्त्येत उद्धृत करते हुए स्पष्ट किया है कि मर्माभिगातजन्य अपायों से बचने के लिये इन मर्म स्थानोँ के बारे में जानना और समझना अत्यंत आवश्यक है।

सोममारुत तेजांसि रजःसत्वतमांसि च।
मर्मसु प्रायशः पुंसां भूतात्मा चावतिष्ठते।।
मर्मस्वभिहता तस्मान्न जीवति शरीरिणः।
महर्षि सुश्रुत के अनुसार सोम,वायु ,तेज ,रजोगुण,सत्वगुण और तमोगुण जीव आत्मा का निवास स्थान मर्म है अतः मर्म स्थानों पर आधारित आघात से मनुष्य जीवित नहीं रहता है

आइये जानते हैं कितने हैं मर्म बिंदु :

सप्तोतरं मर्मशतं यानि 107 हैं तानि मर्मणि पंचात्मकानि भवन्ति ।अर्थात पांच आत्मा युक्त हैं जिसे शरीर के अर्थ में लिया गया हैइसे शरीर के निर्माणकारी 5 तत्वों मांस,सिरा,स्नायु,अस्थि एवं संधि से लिया गया है।अष्टांग हृदय में आचार्य वाग्भट्ट ने उक्त 5 मर्मों के अतिरिक्त धमनी मर्म का भी उल्लेख किया है।

माँसास्थिस्नायुधमनीसिरासंधिसमागमः। स्यानमरमेंति ते वां सुतरां जीवितं स्थितम।।

महर्षि सुश्रुत ने “न खलू मांससिरास्नायुसध्यस्थियतिरेकेणान्यानि मर्माणिभवन्ति यस्मान्नोपलभ्यन्ते” द्वारा यह स्पष्ट किया है कि मांस,सिरा,स्नायु ,अस्थि एवं संधि यही 5 भेदों के अनुसार मर्म होते हैं।
महर्षि सुश्रुत महर्षि वाग्भट्ट
11 मांस मर्म 10 मांस मर्म
41 सिरामर्म। 37 सिरामर्म
27 स्नायु मर्म। 23 स्नायु मर्म
8 अस्थि मर्म। 8 अस्थि मर्म
20 संधि मर्म। 9 धमनी मर्म
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कुल 107 मर्म बताये गये हैं

आइये अब जानते हैं अंग भेद से मर्मों के भेद:

– प्रत्येक शाखा में 11यानि 11 x 4 =44
-पेट और छाती में 12
-पीठ में 14
-गर्दन के ऊपर 37
मर्म स्थित होते हैं।

आइये अब जानते है मर्मों पर आघात से होनेवाले परिणामो म अनुसार मर्मों के भेद:

-आघात से फौरन मृत्यु हो तो सद्यः प्राणहर मर्म: 19
-कुछ समय बाद मृत्यु हो जाय तो कालांतर प्राणहर मर्म :33
-आघात होने पर विकलांगता हो तो वैक्ल्यकर मर्म :44
-आहत स्थान पर शल्य के रहने पर प्राणी जीवित और शल्य को पृथक करने से मृत्यु हो जानेवाले मर्म स्थान विशल्यध्न :3
-वेदना करने वाले रुजाकर मर्म 8 बताये गये हैं।
-सद्यः प्राणहर मर्म उन्हें कहा जाता है जिनपर आघात से मृत्यु 7 दिनों के अंदर हो जाये।
-कालांतर प्राणहर मर्म उन्हें कहा जाता है जिनपर आघात से दो सप्ताह में मृत्यु हो जाय।
– विशल्यघन मर्म उन्हें कहते हैं जिनपर शल्य के रहने या स्वयं पक कर निकल जाने तक व्यक्ति जीवित रहता है और शल्य (foreign body)को निकाल देने से मृत्यु हो जाती है।
-वैकल्यकर मर्म उन मर्म स्थानों को कहा जाता है जिनपर आघात से स्थायी रूप से विकलता यानि विकलांगता आ जाती है।
-रुजाकर मर्म पर आघात से वेदना होती है।

आइये जानते हैं क्यों सद्यः प्राणहर मर्मों पर आघात से फौरन मृत्यु हो जाती है?
सद्यः प्राणहर मर्म का स्वभाव आग्नेय माना गया है अर्थात अग्नि महाभूत की प्रधानता के कारण,इस पर आघात से अग्नि क्षय के कारण तत्काल मृत्यु का होना माना गया है ।जैसा की आप सभी जानते है कि अग्नि हमारे शरीर की प्राकृतिक उष्मा है जिसके क्षरण से मृत्यु होना स्वाभाविक है।

इसी प्रकार कालांतर प्राणहर मर्मों को सौम्य आग्नेय प्रकृति का माना गया है अर्थात इन मर्म स्थानों में जल और अग्नि दोनों ही महाभूत प्रधान होते हैं जिस कारण इन पर आघात से शरीर के लिये आवश्यक दोनों ही महाभूतों के क्रमशः क्षीण होने के कारण व्यक्ति की कुछ समय बाद मृत्यु हो जाती है।

इसी प्रकार वैकल्यकर मर्म स्थानों को सौम्य गुण प्रधान माना गया है सौम्य गुण के शीतल और स्थिर होने के कारण प्राण तो स्थिर रहते हैं परंतु विकलांगता अवश्य उत्पन्न हो जाती है।
रुजाकर मर्म स्थान को अग्नि एवं वायु महाभूत प्रधान माना गया है अतः इन स्थलों पर अभिघात से वेदना उत्पन्न होती है।ये तो हुई मर्म विज्ञान के शास्त्रीय सूक्ष्म परिचय की बात,लेकिन इन मर्म विन्दुओ की सटीक जानकारी लेकर आप स्वास्थ्य संरक्षण सहित रोग निवारण भी कर सकते हैं इसकी जानकारी आपको हैंड्स आन ट्रेनिंग के माध्यम से दी जाती है।

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