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वृक्षों का महत्व एवं वृक्षआयुर्वेद

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images पेड़पौधे हमारे लिए प्रकृति के अनूठे वरदान हैं,इनसे हमें केवल हरियाली एवं फलों एवं फूलों की प्राप्ति ही नहीं होती  बल्कि ये हमारे अच्छे स्वास्थ्य के लिए भी हमारे प्राकृतिक सहयोगी मित्र हैं I आयुर्वेद में भी वृक्षों की महत्ता को विभिन्न सन्दर्भों में वर्णित किया गया है Iआयुर्वेद सूत्र ‘प्रसन्नात्मेद्रिय मनः’  अनुसार मन एवं इन्द्रियों की प्रसन्नता को स्वास्थ्य का आधार मानता है और आधुनिक विज्ञान भी स्वास्थ्य के लिए मानसिक एवं शारीरिक रूप से स्वस्थ होने को स्वस्थ जीवन का आधार मानता है I अमेरिका  की यूनिवर्सीटी आफ एक्सटर के शोधकर्ताओं के अनुसार वृक्ष एवं पौधे हमें स्वस्थ एवं खुश रहने में मददगार होते हैं,अर्थात पेड़ पौधे एक नेचुरल एंटीडीप्रेसेंट का कार्य करते हैं I एक अध्ययन में यह पाया गया है शहर वो हिस्सा जहां अधिक हरियाली पायी जाती है वहाँ चिकित्सकों द्वारा रोगियों को अल्प मात्रा में एंटीडीप्रेसेंट दवाओं को लेने की सलाह दी जाती है(उपरोक्त शोध के आंकड़े वर्ष 2009-10 में लन्दन के आसपास से संग्रहित किये गए हैं )जलवायु परिवर्तन एवं प्राकृतिक स्रोतों का अंधाधुंध उपयोग आज वैश्विक स्तर की समस्या बन चुका है और दुनिया के देश इस वक्त इस मामले में एक दूसरे पर दवाब डाल रहे हैं ताकि आनेवाली पीढ़ियों पर हमारे द्वारा पैदा की जा रही चुनौती से कैसे निपटा जाय ? इसके लिए हमें सबसे पहले छोटे-छोटे समझे जानेवाले लेकिन व्यापक प्रभाव रखने वाले उपायों पर अपना ध्यान केन्द्रित करना नितांत आवश्यक है Iपेड़ पौधों के साथ हमारा समन्वय भी इस दिशा में एक बड़ा कदम है Iआपके मन में मेरे इस लेख की ऊपर की कुछ पंक्तियों से यह सवाल उठ खडा हुआ होगा कि पेड़ पौधों का हमारी खुशियों से भला क्या सम्बन्ध हो सकता है !आईये मैं इसे और अधिक स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ :जापान में लोग जंगलों में ‘फारेस्ट-बाथिंग’ करते हैं,ऐसा लोग अपने  कुछ पल शान्ति से पेड़पौधों के बीच बिताने के उद्देश्य से करते हैं I लोग जंगलों के मध्य लम्बी वाक् को नियमित दिनचर्या का अंग बनाते हैं और शायद इन्ही कारणों से जापानी लोग अधिक खुश एवं लम्बी आयु को जीने वाले होते हैं Iताओइज्म में भी पेड़ पौधों के मध्य मेडिटेशन करने की परम्परा रही है और यह माना जाता रहा है कि वृक्ष आपके भीतर की नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित कर लेते हैं Iयदि हम वृक्षों को ‘नेचुरल-हीलर’ कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी Iजेओफ्री डोनोवन नामक वैज्ञानिक ने एक शोध एक विशेष क्षेत्र में पेड़ों की कटान से होनेवाली मृत्यु एवं लोगों की मृत्यु के बीच तुलनात्मक रूप से किया,अध्ययन के परिणाम चौकाने वाले थेI जिस क्षेत्र में पेड़ों का अंधाधुंध कटान हो रहा था उस क्षेत्र में ह्रदयघात एवं श्वास संबंधी समस्याओं से होनेवाली मृत्युदर अधिक पायी गयी I कुछ अपवादों को छोड़ दे तो एक अन्य अध्ययन में यह पाया गया कि जिन क्षेत्रों में घने जंगल थे उन क्षेत्रों में क्राईम रेट कम था Iकुल मिलाकर पेड़-पौधों से हमारा जितना अधिक सामंजस्य होगा हम उतने ही सुखायु के करीब होंगे Iआयुर्वेद शास्त्र भी हमें अपने पर्यावरण से सामजस्य बनाने की सलाह देता है एवं आयुर्वेद को सभी जीवित प्राणियों के आयु का विज्ञान मानता है Iवैदिक काल से ही भारत वर्ष में प्रकृति के निरीक्षण, परीक्षण एवं विश्लेषण की प्रवृत्ति रही है। इसी प्रक्रिया में वनस्पति जगत का भी विश्लेषण किया गया। प्राचीन वांगमय में इसके अनेक संदर्भ ज्ञात होते हैं। अथर्ववेद में पौधों को आकृति तथा अन्य लक्षणों के आधार पर सात उपविभागों में बांटा गया, यथा- (1) वृक्ष (2 ) तृण (3 ) औषधि (4 ) गुल्म (5 ) लता (6 ) अवतान (7 ) वनस्पति।आगे चलकर महाभारत, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, शुक्रनीति, वृहत्‌ संहिता, पाराशर, चरक, सुश्रुत, उदयन आदि द्वारा वनस्पति, उसकी उत्पत्ति, उसके अंग, क्रिया, उनके विभिन्न प्रकार, उपयोग आदि का विस्तार से वर्णन किया गया, जिसके कुछ उदाहरण हम निम्न संदर्भों में देख सकते हैं। पौधे जड़ नहीं होते अपितु उनमें जीवन होता है। वे चेतन जीव की तरह सर्दी-गर्मी के प्रति संवेदनशील रहते हैं, उन्हें भी हर्ष और शोक होता है। वे मूल से पानी पीते हैं, उन्हें भी रोग होता है इत्यादि तथ्य हजारों वर्षों से हमारे यहां ज्ञात थे तथा अनेक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।महाभारत के शांतिपर्व के 184 वें अध्याय में महर्षि भारद्वाज व भृगु का संवाद है। उसमें महर्षि भारद्वाज पूछते हैं कि वृक्ष चूंकि न देखते हैं, न सुनते हैं, न गन्ध व रस का अनुभव करते हैं, न ही उन्हें स्पर्श का ज्ञान होता है, फिर वे पंच भौतिक व चेतन कैसे हैं? इसका उत्तर देते हुए महर्षि भृगु कहते हैं- हे मुने, यद्यपि वृक्ष ठोस जान पड़ते हैं तो भी उनमें आकाश है, इसमें संशय नहीं है, इसी से इनमें नित्य प्रति फल-फूल आदि की उत्पत्ति संभव है।वृक्षों में जो ऊष्मा या गर्मी है, उसी से उनके पत्ते, छाल, फल, फूल कुम्हलाते हैं, मुरझाकर झड़ जाते हैं। इससे उनमें स्पर्श ज्ञान का होना भी सिद्ध है।

सुखदु:खयोश्च ग्रहणाच्छिन्नस्य च विरोहणात्‌।जीवं पश्यामि वृक्षाणां चैतन्यं न विद्यते॥ 

वृक्ष कट जाने पर उनमें नया अंकुर उत्पन्न हो जाता है और वे सुख, दु:ख को ग्रहण करते हैं। इससे मैं देखता हूं कि कि वृक्षों में भी जीवन है। वे अचेतन नहीं हैं।महर्षि चरक अनुसार – ‘तच्येतनावद्‌ चेतनञ्च‘अर्थात्‌-प्राणियों की भांति उनमें (वृक्षों में) भी चेतना होती है।आगे उद्धृत करते हैं  ‘अत्र सेंद्रियत्वेन वृक्षादीनामपि चेतनत्वम्‌ बोद्धव्यम्‌‘ अर्थात्‌-वृक्षों की भी इन्द्रिय है, अत: इनमें चेतना है। इसको जानना चाहिए। बंगाल के प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री डा. गिरिजा प्रसन्न मजूमदार ने ‘हिस्ट्री ऑफ साइंस इन इंडिया‘ में वनस्पति शास्त्र से संबंधित अध्याय में महामुनि पाराशर द्वारा रचित ग्रंथ ‘वृक्ष आयुर्वेद‘ का वर्णन किया है।इस ग्रंथ में जो वैज्ञानिक विवेचन किया गया है, वह विस्मयकारी है। इस पुस्तक के 6  भाग हैं- (1 ) बीजोत्पत्ति काण्ड (2 ) वानस्पत्य काण्ड (3 ) गुल्म काण्ड (4 )वनस्पति काण्ड (5 ) विरुध वल्ली काण्ड (6 ) चिकित्सा काण्ड।इस ग्रंथ के प्रथम भाग बीजोत्पत्ति काण्ड में आठ अध्याय हैं जिनमें बीज के वृक्ष बनने तक की गाथा का वैज्ञानिक पद्धति से विवेचन किया गया है। इसका प्रथम अध्याय है बीजोत्पत्ति सूत्राध्याय, इसमें महर्षि पाराशर कहते हैं-

 आपोहि कललं भुत्वा यत्‌ पिण्डस्थानुकं भवेत्‌।तदेवं व्यूहमानत्वात्‌ बीजत्वमघि गच्छति॥

पहले पानी जेली जैसे पदार्थ को ग्रहण कर न्यूक्लियस बनता है और फिर वह धीरे-धीरे पृथ्वी से ऊर्जा और पोषक तत्व ग्रहण करता है। फिर उसका आदि बीज के रूप में विकास होता है और आगे चलकर कठोर बनकर वृक्ष का रूप धारण करता है। आदि बीज यानी प्रोटोप्लाज्म के बनने की प्रक्रिया है जिसकी अभिव्यक्ति बीजत्व अधिकरण में की गई है।दूसरे अध्याय भूमि वर्गाध्याय में पृथ्वी का उल्लेख है। इसमें मिट्टी के प्रकार, गुण आदि का विस्तृत वर्णन है।तीसरा अध्याय वन वर्गाध्याय का है। इसमें 14 प्रकार के वनों का उल्लेख है। चौथा अध्याय वृक्षांग सूत्राध्याय (फिजियॉलाजी) का है। इसमें प्रकाश संश्लेषण यानी फोटो सिंथेसिस की क्रिया के लिए कहा है- ‘पत्राणि तु वातातपरञ्जकानि अभिगृहन्ति।‘वात (वायु),आतप (उष्मा)  एवं रंजक (क्लोरोफिल )  से अपना भोजन वृक्ष बनाते हैं। इसका स्पष्ट वर्णन इस ग्रंथ में है।पांचवा पुष्पांग सूत्राध्याय है। इसमें कितने प्रकार के फूल होते हैं, उनके कितने भाग होते हैं, उनका उस आधार पर वर्गीकरण किया गया है। उनमें पराग कहां होता है, पुष्पों के हिस्से क्या हैं आदि का उल्लेख है। फलांग सूत्राध्याय में फलों के प्रकार, फलों के गुण और रोग का वर्गीकरण किया गया है। सातवें वृक्षांग सूत्राध्याय में वृक्ष के अंगों का वर्णन करते हुए पाराशर कहते है- पत्रं (पत्ते) पुष्प (फूल) मूलं (जड़) त्वक्‌ (शिराओं सहित त्वचा) काण्डम्‌ (स्टेम ) सारं (कठोर तना) सारसं , र्नियासा   बीजं (बीज) प्ररोहम्‌  -इन सभी अंगों का परस्पर सम्बन्ध होता है। आठवें अध्याय में बीज से पेड़ के विकास का वर्णन किया गया है। बीज के बारे में जो कहा गया है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। बीज और पत्रों की प्रक्रिया में वे कितनी गहराई में गए, यह तय करना आज के वनस्पति शास्त्र के विद्वानों का दायित्व है। पाराशर कहते हैं-

 ‘बीज मातृका तु बीजस्यम्‌ बीज पत्रन्तुबीजमातृकायामध्यस्थमादि‘पत्रञ्च मातृकाछदस्तु तनुपत्रकवत्‌ मातृकाछादनञ्च कञ्चुकमित्याचक्षते॥ बीजन्तु प्रकृत्या द्विविधं भवति एकमातृकं द्विमातृकञ्च। तत्रैकपत्रप्ररोहानां वृक्षाणां बीजमेकमातृकं भवति। द्वि पत्र प्ररोहानान्तु द्विमातृकञ्च।

यानी मोनोकॉटिलिडेन और डायकॉटिलिडेन। यानी एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री बीजों का वर्णन है। किस प्रकार बीज धीरे-धीरे रस ग्रहण करके बढ़ते हैं और वृक्ष का रूपधारण करते हैं। कौन- सा बीज कैसे उगता है, इसका वर्गीकरण के साथ उसमें स्पष्ट वर्णन है।यह भी वर्णन है कि बीज के विभिन्न अंगों के कार्य अंकुरण (जर्मिनेशन) के समय कैसे होते हैं-

 अंकुरनिर्विते बीजमात्रकाया रस:संप्लवते प्ररोहांगेषु।

 यदा प्ररोह: स्वातन्त्रेन भूम्या: पार्थिवरसं गृहणाति तदा बीज मातृका प्रशोषमा पद्यमे। (वृक्ष आयुर्वेद-द्विगणीयाध्याय) 

वृक्ष के विकास की गाथावृक्ष रस ग्रहण करता है, बढ़ता है। आगे कहा गया है कि जड़ बन जाने के बाद बीज मात्रिका यानी बीज पत्रों की आवश्यकता नहीं रहती, वह समाप्त हो जाती है। फिर पत्तों और फलों की संरचना के बारे में कहा है कि वृक्ष का भोजन पत्तों से बनता है। पार्थिव रस जड़ में से स्यंदिनी नामक वाहिकाओं के द्वारा ऊपर आता है, यह मानो आज के ‘एसेण्ट ऑफ सैप‘ का वर्णन है। यह रस पत्तों में पहुंच जाता है। जहां पतली-पतली शिराएं जाल की तरह फैली रहती हैं। ये शिरायें दो प्रकार की हैं- ‘उपसर्प‘ और ‘अपसर्प‘। वे रस प्रवाह को ऊपर भी ले जाती हैं और नीचे भी ले जाती हैं। दोनों रास्ते अलग-अलग हैं। गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध भी वे रस ऊपर कैसे ले जाती हैं इसके बारे में आज के विज्ञान में पूरा ज्ञान नहीं है। जब तक कैपिलरी एक्शन का ज्ञान न हो तब तक यह बताना संभव नहीं है और यह ज्ञान बहुत समय तक पश्चिमी देशों को नहीं था। कैपिलरी मोशन संबंधी भौतिकी के सिद्धांत का ज्ञान बॉटनी के ज्ञान के साथ आवश्यक है। जब पत्तों में रस प्रवाहित होता है, तब क्या होता है इसे स्पष्ट करके ग्रंथ में कहा गया है-‘रंजकेन पश्च्यमानात‘ किसी रंग देने वाली प्रक्रिया से यह पचता है-यानी फोटोसिंथेसिस। यह बड़ा महत्वपूर्ण है। इसके पश्चात्‌ वह कहते हैं कि ‘उत्पादं- विसर्जयन्ति‘ हम सब आज जानते हैं कि पत्तियां फोटो सिंथेसिस से दिन में आक्सीजन निकालती हैं और रात में कार्बन डाय अक्साइड। दिन में कार्बनडायआक्साइड लेकर भोजन बनाती हैं। अतिरिक्त वाष्प का विसर्जन करती हैं, जिसे ट्रांसपिरेशन कहते हैं। इस सबका वर्णन इसमें है।आगे कहा कि जब उसमें से वाष्प का विसर्जन होता है तब उसमें ऊर्जा उत्पन्न होती है, यानी श्वसन की क्रिया का वर्णन है। संक्षेप में यह वर्णन बताता है कि किस प्रकार रस का ऊपर चढ़ना, पंक्तियों में जाना, भोजन बनाना, फिर श्वसन द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करना होता है। इस सारी क्रमिक क्रिया से पेड़ बनता है। इसके अतिरिक्त आज भी कोई दूसरी प्रक्रिया वृक्षों के बढ़ने की ज्ञात नहीं है। अर्थात वृक्षआयुर्वेद एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें पौधों की जीवन की पूरी प्रक्रिया का वर्णन प्राप्त  होता है Iइस लेख का मूल उद्देश्य वृक्षों के प्रति मानवीय संवेदनशीलता को और अधिक  विकसित करना है जैसे हमारे मित्रों के द्वारा दिये गए तनाव या खुशी से हम नकारात्मक  रूप अथवा सकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं ठीक ऐसा ही वृक्षों के साथ हमारा सम्बन्ध भी है फर्क सिर्फ इतना है कि वृक्ष हमारी सारी नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित कर लेते है तथा हमें सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण कर देते हैं I

 

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1 thought on “वृक्षों का महत्व एवं वृक्षआयुर्वेद

  1. प्रक्रुति प्रेमी लोगोके लीये बहुत अच्छा विग्नान।

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