आयुष दर्पण

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आयुर्वेद एवं शोध जानें विशेषज्ञ की राय

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युर्वेद लगभग, 5000 वर्ष पुराना चिकित्‍सा विज्ञान है। इसे भारतवर्ष के विद्वानों ने भारत की जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियों, भारतीय दर्शन, भारतीय ज्ञान-विज्ञान के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए विकसित किया है। वर्तमान में स्‍वतंत्रता के पश्‍चात आयुर्वेद चिकित्‍सा विज्ञान ने बहुत प्रगति की है।

आज भी दुनिया में, हर्बल मेडिसिन के क्षेत्र में कानूनों की रुकावट के कारण जब हमारी हर्बल मेडिसिन एक्सपोर्ट होती है तो लिखा जाता है कि अडिशनल फूड के रूप में उसको लिखा जाता है। अतिरिक्त आहार के रूप में उसको भेजा जाता है। मेडिसिन के रूप में आज भी उसको स्वीकृति नहीं मिली है। आप जानते हैं दवा उद्योग की ताकत कितनी है। वो आपको ऐसे आसानी से घुसने नहीं देंगे। वे किसी भी हालत में आपको दवाओं की वैश्विक स्वीकृति नहीं देंगे। बड़ी चुनौती है, लेकिन अगर जन सामान्य को इसमें विश्वास हो गया तो कितनी ही बड़ी ताकतवर संगठन हो, आपको रोक नहीं सकता है।

दुर्भाग्य से हमने आयुर्वेद और ऐलोपैथी दोनों जैसे कोई दुश्मन हो इस प्रकार का माहौल बना दिया। हमारी पूरी व्याख्या ऐसी है। यह व्याख्या बदलनी होगी। हम भी तो विवाद करते रहते है भई आयुर्वेद जो है वह मूल से बीमारी को दूर करता है और ऐलोपैथी तो ऊपर ऊपर relief करता है और दुत्कारते हैं और फिर वह ही करते हैं। जब तक हम यह न कहे कि ऐलोपैथी एक रास्ता है लेकिन आयुर्वेद यह जीवन पद्धति है। यह जीवन शैली है। आयुर्वेद को लेकर हमारा पूरा फोकस बदलना होगा। हम ऐलोपैथी के साथ संघर्ष का चेहरा लेकर के चलेंगे तो उस लड़ाई से हमें फायदा नहीं है। हमें फायदा इस बात में है। और जिस प्रकार से योग ने अपनी जगह बना ली आयुर्वेद भी अपनी जगह बना सकता है। अगर नई बीमारियां आएंगी तो ऐलोपैथी वाले संभाल लेंगे लेकिन बीमारियां न आए वह तो आयुर्वेद ही संभाल सकता है।

मेरा मानना है कि आयुर्वेदिक ग्रंथों में बतायी गयी सूक्ति व सूत्र रूप बातों को Research Based Interventions में Hypothesis के रूप में प्रयोग करके Research clue बनाया जा सकता है। यानी Modern Scientific Parameters पर शोध कार्य करके अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य Ayurvedic Medicines बनायी जाएँ।आयुर्वेद में औषधियों को बनाने का तरीका इतना सटीक है कि अब अनेक शोधकर्ता इसको बिना Animal और Human Toxicity Studies के भी recommend कर रहे हैं क्योंकि अधिकांश आयुर्वेदिक दवाओं को बनाने में उनको शुद्ध करने का detailed procedure पहले ही follow किया जा चुका है। यहां एक बात अवश्य ध्यान देने की है कि न केवल रोगी को दवा देने में बल्कि दवा को बनाने में भी आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित पूरी विधि व तरीके को अपनाना चाहिए तभी पूरी सफलता मिलेगी अन्यथा नहीं (जैसे-दवाओं का शोधन, उनके संयोग, अनुपान, पथ्य – अपथ्य आदि)।

प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सकों ने हर औषधि के गुणों और उनका शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव का गहराई से अध्ययन किया था और आज भी यह विज्ञान आधुनिक शोधकर्ताओं को शोध करने के नए-नए विषय प्रदान कर रहा है। आयुर्वेद का एक सिद्धांत है जो बहुत ही महत्वपूर्ण है और वह है किसी एक औषधि का शरीर के किसी एक अंग पर विशेषकर कार्यकारी होना। जैसे अशोक गर्भाशय पर विशेषकर कार्य करता है, गुग्गुलु संधियों पर, पुनर्नवा किडनी और अर्जुन ह्रदय पर कार्य करता है। इससे लाभ यह होगा कि किसी विशेष अंग की बीमारी को दूर करने के लिए उसके अनुरूप के साथ अन्य दवाओं का योग करके प्रयोग किया जा सकेगा जिससे रोग दूर करना अधिक आसान होगा। जैसे घी या शहद में यदि लौह भस्म मिलाकर दी जाये तो यह आँखों के लिए बहुत ही लाभकारी होगा। सप्तामृत लौह नामक औषधि इसका एक प्रमुख उदाहरण है।

अगर आयुर्वेद का अनुसरण सिद्धांतों के आधार पर नहीं क्या जाता है तो इसका हश्र वैसा ही होगा जैसा Reserpine नामक दवा का कुछ दशक पहले हुआ था। सन 1931 में Rauwolfia serpentina की जड़ का उन्माद, मनोरोग, पागलपन और उच्चरक्तचाप में सफल प्रयोग Indian Journal में छपा था। 1955 तक इसपर ख़ास ध्यान नहीं दिया गया था। 1955 में British Heart Journal में हृदय रोगों में Rauwolfia की उपयोगिता को बताया गया। इसके बाद इस औषधि पर अपने नाम की मोहर लगाने के उद्देश्य से German Scientists ने मनमाने तरीके से इसके केमिकल Reserpine और अन्य Alkaloids का उपयोग हृदय रोग में करना प्रारम्भ कर दिया। कुछ ही वर्षों में इसके उपयोग से अनेक रोगियों में Parkinsonism ,आलस्य, वजन बढ़ने जैसे side effects पाए जाने लगे। फिर क्या था यह दवा मार्केट से हटा ली गयी।

लेकिन यही दवा भारत में यह आज भी सैकड़ों वर्षों की भांति सफलतापूर्वक रोग निवारण के लिए उपयोग में लायी जा रही है; क्योंकि इसे आयुर्वेदिक औषधि के रूप में उत्पादन से लेकर रोग निवारण तक शास्त्रोक्त तरीके से प्रयुक्त किया जाता है न की मात्र केमिकल के रूप में। इससे सिद्ध होता है कि आयुर्वेदिक औषधि को पूर्ण रूप से लेने पर ही लाभ होगा क्योंकि इसी प्रकार इसका उपयोग हमारे प्राचीन अनुसंधानकर्ताओं ने बताया है। गुग्गुलु के बारे में हुयी रिसर्च से पता चलता है कि किस तरह आयुर्वेदिक औषधियां वर्तमान समय में पुरानी से पुरानी बीमारियों के इलाज में भी सफल हैं।

आयुर्वेद शोधकर्ताओं ने वर्षों पहले ही यह जान लिया था कि प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित मेदोरोग वर्तमान समय में Atherosclerosis कहे जाने वाले रोग से बहुत मिलता जुलता है। सुश्रुत संहिता में वर्णित श्लोक में गुग्गुलु का मेदोरोग में उपयोग पढकर; शोधकर्ताओं ने गुग्गुलु की कोलेस्ट्रोल कम करने की शक्ति को पहचाना और इसके द्वारा आधुनिक विज्ञान की कसौटियों और मानकों का पालन करते हुए इसे ऐलोपैथिक दवा के रूप में विकसित किया। वर्तमान में यह द्रव्य Gugglip नाम से बनायी जा रही है। हांलांकि इसका पूर्ण रूप से विकास होने में लगभग दो दशक लग गए थे। इस शोध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि गुग्गुलु को ठीक उसी तरीके से बनाया गया था जैसा प्राचीन ग्रंथों में इसे बनाने के लिए निर्देशित किया गया था।

आयुर्वेद चिकित्सा में द्रव्य का प्रयोग जीवाणु से लड़ने के लिए नहीं बल्कि रोग के कारणों को दूर करने के लिए किया जाता है। यही वजह है आयुर्वेदिक औषधि किसी एक जीवाणु अथवा रोग पर कार्य करने के लिए सीमित होने की बजाय सम्पूर्ण शरीर के अनेक संस्थानों पर कार्य करती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है गुडूची और शतावरी। इन पर हुए अनुसंधान द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि गुडूची और शतावरी शरीर की रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता (Immunity) को बढाते हैं। इनके उपयोग से रोगियों में मनोवैज्ञानिक और शारीरिक तनाव से होने वाले Organ dysfunction नहीं होते। शरीर की immune cells पर हुए इनके प्रभाव के द्वारा इनके Anti-stress effect का पता चला है। इस शोध कार्य से यह पता चला है की Immune cells का stimulation PNI Axis द्वारा होने पर इनका शरीर पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है। जानवरों पर हुए शोध से पता चलता है की गुडूची एंटी बायोटिक तो नहीं है परन्तु Gentamycin की तरह यह जीवाणु संक्रमण को रोकने में लाभदायक है।

किन्तु यह कैसे हुआ? दरअसल इस औषध ने शरीर में पाए जाने वाले neutrophil cells की संख्या को बढ़ा दिया। यह cells शरीर पर आक्रमण कर रहे जीवाणुओं को मारने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। गुडूची और शतावरी द्रव्यों को शास्त्रों में रसायन बताया गया है जिसका अर्थ है वो द्रव्य जो शरीर के बल को बढाते हैं व सभी प्रकार के रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करते हैं।

आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुसार द्रव्य निर्माण के समय औषधियों में कुछ ऐसे भी द्रव्य भी मिलाने चाहिए जिनकी उपस्थिति से उस द्रव्य का शरीर में Absorption तेज़ी से होने लगे । ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जिसमें किसी द्रव्य के घटक में कोई एक घटक अलग से किसी रोग को दूर करने में समर्थ नहीं होता है पर किसी विशेष द्रव्य के मिल जाने से वह भी रोग दूर कर देता है। ऐसा Bioavailability principle के द्वारा होता है।Regional Research Laboratory Jammu में हुए Research के अनुसार काली मिर्च में पायी जाने वाला piperizine intestinal barrier में काफी तेज़ी से absorb होता है। IIS Bangalore में शोध से सिद्ध हो चुका है की Piperizine Anti- tubercular drug Rifampicin के लिए Bio-enhancer का कार्य करता है अर्थात उसके अवशोषण और प्रभाव को बढाता है। इस केस में संभवतः TB Bacteria के RNA Polymer पर इसका कार्य होता है। Piperizine के कारण TB Drug की शरीर में absorption power बढ़ गयी। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अगर Rifampicin को कालीमिर्च के साथ लिया जाये तो इसे वर्तमान मात्रा से कम मात्रा में लेना पड़ेगा जिससे इसका कार्य भी सिद्ध होगा और कोई side effect भी नहीं होंगे।

इसी तरह का एक experience researchers को और हो चुका है। एक बार लहसुन की Facial palsy नामक बीमारी पर क्लिनिकल स्टडी चल रही थी। वह रोगी TB से भी पीड़ित था। जब Facial palsy के इलाज के दौरान उस रोगी को 15 दिन तक मक्खन के साथ लहसुन दिया गया तो उस रोगी को T.B के दौरान होने वाली सामान्य समस्याएं जैसे बुखार, खांसी, सांस लेने में परेशानी जैसी दिक्कतों में तो फायदा हुआ ही साथ ही Facial palsy में भी लाभ हुआ। इसी लाभ को देखते हुए एक फार्मास्यूटिकल कम्पनी ने piperizine नाम की दवा बनानी शुरू कर दी।

इसी प्रकार हरीतकी को एरंड तेल के साथ भावना देकर गन्धर्व हरीतकी नामक औषधि बनायी जाती है जो एक बहुत अच्छा विरेचक द्रव्य है। त्रिकटु चूर्ण में सैन्धव लवण मिला दें तो यह इसकी absorption और penetrating power को बढा देता है। यदि obstructive jaundice में यह प्रयुक्त किया जाए तो इसकी choleretic power बढ़ जायेगी और इसके कार्य करने की क्षमता में सुधार होगा।

आयुर्वेद में बतायी गयी साम्यावस्था नामक अवस्था को अब स्वीकार कर लिया गया है और इसे molecular pharmacodynamics में apply किया जा रहा है। इससे सिद्ध होता है single molecular agents पर आधारित आधुनिक चिकित्सा शास्त्र अभी अधूरा है और इसमें आयुर्वेद में कही गयी नामक अवधारणा को समाहित करना आवश्यक है।

इस तरह से हम पाते हैं कि आयुर्वेद में शोध करने के बहुत सारे क्षेत्र है। बस rational thinking से काम करते हुए initiative लेने की आवश्यकता है। यही एक ऐसा क्षेत्र है जहां आधुनिक विज्ञान ने आयुर्वेद के साथ मिलकर कार्य किया तो मानवता के लिए असाध्य रोगों की चिकित्सा में भी मिलेगी।

उपरोक्त लेख आयुष दर्पण के सुधि पाठको के लिये डॉ स्वस्तिक जैन द्वारा लिखा गया है।डॉ स्वस्तिक जैन एक अच्छे ब्लॉग लेखक है तथा शोध में विशेष अभिरुचि रखते है।आयुर्वेदाचार्य,एमबीए एवं एम फिल की उपाधि प्राप्त डॉ जैन वर्तमान में आयुष विभाग के अंतर्गत हरिद्वार में चिकित्साधिकारी के पद पर सेवाये दे रहे हैं।

 

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