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कोशिकाओं के आक्सीजन के प्रति व्यवहार की खुली परतें!

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हर जीवित प्राणी अपने भोजन को ऊर्जा में परिवर्तित करने हेतु आक्सीजन का उपभोग करता है यह बात सदियों से मालूम थी लेकिन कोशिकाएं किस प्रकार आक्सीजन के अलग अलग लेवल्स को अपनाती है यानि हम यह कहें कि आक्सीजन के शरीर में महत्व के मूल सिद्धांतों को आधुनिक विज्ञान आज भी नही जान पाया था। कोशिकाएं किस प्रकार आक्सीजन के प्रति सेंसिबल होती है साथ ही आक्सीजन की उपलब्धता के अलग अलग स्तरों के प्रति किस प्रकार स्वयम में परिवर्तन लाती है यह बात विलियम जे केलिन जूनियर,सर पीटर जे रेटकलिफ्फ एवं ग्रेग एल सेमेंजा दुनिया को समझाने में कामयाब रहे।उन्होंने कोशिकाओं की मॉलिक्युलर मशीनरी जो ऑक्सीजन के अलग अलग स्तर पर शरीर मे जीन्स की एक्टिविटी को नियंत्रित करती है का पता लगाया ।इससे शरीर मे आक्सीजन के अलग अलग स्तरों पर कोशिकाओं के मेटाबोलिज्म एवं फीजयोलॉजिकल कार्यों पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने में भी मदद मिलेगी।उनके इस खोज से एनीमिया,कैंसर जैसी अनेक बीमारियों के लिये चिकित्सा के नए आयाम ढूंढने में मदद मिलेगी।
क्या महत्व है शरीर मे आक्सीजन का
हम सभी जानते है कि आक्सीजन महज आक्सीजन के दो परमाणु यानि O2 पृथ्वी के पूरे वातावरण का 1/5 हिस्से पर आधिपत्य रखते हैं ये जीवन के लिये अत्यंत आवश्यक तत्व है जिसका उपभोग शरीर की कोशिकाओं में स्थित माइटोकॉन्ड्रीया भोजन से ऊर्जा पैदा करने के लिये करता है।1931 में नोबेल पुरष्कार से सम्मानित ऑटो वारबर्ग ने सबसे पहले इस पूरी प्रक्रिया को शरीर मे एन्जाइम्स की मदद से होने वाली प्रक्रिया के रूप में दुनिया को बताया था।जीवीत शरीर की कालांतर में एवोल्यूशन के दौरान यह मैकेनिज्म भी सामने आई जिससे कि कोशिकाएं आक्सीजन का इस्तेमाल भोजन को जला ऊर्जा प्राप्त करने के मकसद से कर सकें।गर्दन के दोनों तरफ बड़ी रक्त नलिकाओं में पाई जानवाली केराटिड बॉडी कुछ विशेष कोशिकाओं से युक्त होती हैं जो रक्त में आक्सीजन के विभिन्न स्तरों के प्रति सेंसिबल होती हैं ।1938 के नोबेल विजेता कोरेनेल हेमेन ने केराटिड बॉडी की आक्सीजन के विभिन्न स्तरों के प्रति सेंसिटीवी तथा मष्तिष्क को सूचना प्रदान कर श्वास प्रश्वास की प्रक्रिया यानि रेस्पाइरेट्री रेट पर नियंत्रण का पता लगाया था ।
कैरोटिड बॉडी द्वारा रक्त में आक्सीजन के स्तर (हायपोकसीया) के कम होने पर भी एक रेपिड एडेप्टेशन की प्रक्रिया अपनाई जाती है इसमें फौरन ही रक्त में एरिथेरोपोईटीन का स्तर बढ़ जाता है जिससे एरेथ्रोपॉइसिस की प्रॉसेस को ट्रिगर कर दिया जाता है फलस्वरूप लाल रक्त कणिकाओं का निर्माण भी अधिक होने लगता है। यानि लाल रक्त कणिकाओं के निर्माण पर एरीथ्रोपोईटीन के नियंत्रण का पता तो 20 वीं सदी में ही चल चुका था,लेकिन यह आक्सीजन के नियंत्रण में कैसे रहती है यह बात अबतक अबूझ पहेली बनी हुई थी।वैज्ञानिक ग्रेग सेमेंजा ने इपीओ जीन का अध्ययन किया और आक्सीजन के शरीर मे विभिन्न स्तरों पर इसके नियंत्रण को देखा।
इसी शोध से मिलते जुलते शोध में इपीओ जीन पर को सर पीटर जे रेटकलिफ्फ ने विस्तृत अध्ययन किया,इन सभी के संयुक्त शोध से यह बात सिद्ध हुई कि हमारे जीवित शरीर के सभी ऊतकोंमें एक आक्सीजन सेंसिबल मैकेनिज्म होता है।और इसी शोध के कारण इन तीनो बैज्ञानिको को वर्ष 2019 के फीजीयोलॉजी एवं मेडिसिन के लिये नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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