क्या है नींद : आयुर्वेद की नज़रों में!

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नींद एक ऐसी प्रवृति जिसका सम्यक रूप से आना उतना ही आवश्यक है जितना जीने के लिये भोजन!
कहा जाता है कि सृष्टि की उत्पति से पूर्व अंधियारा (तम/डार्क मैटर) का बाहुल्य था ,और कहीं न कहीं ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के पीछे इसे मूल कारण माना गया है !जैसा की इस सूत्र में वर्णित है:
लोकादिसर्गप्रभवा तमो मूला तमोमयी।
बाहुल्यात्तमसौ रात्रौ निद्रा प्रायेण जायते।।
सन्दर्भ: अ.स.सू. 9/38
अर्थ है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति तम ( अंधियारे) से हुई है और हमारे पिंड शरीर की ब्रह्माण्ड से साम्यता होने के कारण तम गुण के बढने से रात्रि ( अन्धकार) में नींद आती है।
वैसे शरीर द्वारा नींद आने का कारण शास्त्रों में कुछ यूँ बताया गया है:
श्लेष्मावृतेसु स्रोत:सु श्रमादुपरतेसु च।
इन्द्रीयेषु स्वकर्मभ्यो निद्रा विशति देहिनम।।
सन्दर्भ: अ.स.सू. 9/39
भोजन के पाचन के दौरान आहार रस से उत्पन्न श्लेष्मा के कारण स्रोतस ढक जाते हैं और इन्द्रियाँ अपने विषयों से थोड़े समय के लिये अलग हो जाती है और हमें नींद आ जाती है।
अब आप यह भी जानना चाहेंगे की भई फिर आयुर्वेद के अनुसार स्वप्न क्यूँ आते हैं?
तो इसका उत्तर भी जान लीजिये:
सर्वेन्द्रियव्युपरतौ मनोs नुपरतम यदा।
विषयेभ्यस्तदा स्वपनं नानारुपम प्रपश्यति।।
सन्दर्भ: अ.स.सू.9/40
अर्थ है इन्द्रियाँ अपने विषयों से निवृत तो हो जाती हैं परंतु उभय इन्द्रिय मन निवृत नहीं हो पाता है फलस्वरूप स्वप्न आते हैं।
ये तो रही नींद और सपनो की बात ।अब आप यह भी जानना चाहेंगे कि नींद के आने या न आने से फर्क क्या पड़ता है?
लीजिये यह भी जान लीजिये:
निद्रायत्तम सुखं दु:खं पुष्टि कार्श्य बलाबलम।
वृषता क्लीवता ज्ञानमज्ञानम् जीवितं न च ।।
सन्दर्भ:अ.स.सू.9/41
अच्छी नींद सुख ,शरीर को पोषण देनेवाली,बल प्रदान करनेवाली ,वृष्य ( सामर्थ्य) एवं जीवनदायनी होती है,इसके विपरीत नींद नहीं आना दुःख,कमजोरी,नपुंसकता,अज्ञान और मृत्यु का कारण होती है।
नींद न ज्यादा न कम (सम्यक ) होनी चाहिये। समय के विपरीत (कुसमय),समय पर अधिक नींद एवं बिलकुल नहीं सोना सुख एवं आयु को नष्ट करने वाला होता है ,जिसे कालरात्रि से सम्बोधित किया गया है।
कहा गया है कि:
सैव युक्ता पुनर्युक्ते निद्रादेहम सुखायुषा।
योगिनाभियोगिनौ बुद्धिनिर्मला तपसा यथा।।
सन्दर्भ: अ.स.सू.9/43
अच्छी नींद शरीर को सुख एवं आयु को निर्मलता ठीक उसी प्रकार प्रदान करती है जैसा की योगियों को तत्वज्ञान होने पर बुद्धि निर्मल हो जाती है।
अब आप यह भी जानना चाहेंगे कि आयुर्वेद के नजरिये से रात में या दिन में सोने से क्या फर्क पड़ता है?
लीजिये यह भी जान लीजिये:
रात्रौ जागरणं रुक्षं स्निग्धं प्रस्वप्नम दिवा।
अरुक्षमनभिष्यंदी त्वासिन प्रचलायितम।।
सन्दर्भ:अ.स.सू.9/44
स्पष्ट है कि रात में जागेंगे तो शरीर में रुक्षता बढ़ेगी,दिन में सोयेंगे तो शरीर में स्निग्धता बढ़ेगी…बैठे बैठे झपकी(थोड़ी नींद ) लेंगे तो न तो रुक्षता बढ़ेगी और न स्निग्धता।
अब किस ऋतु में कब सोना चाहिये और कब नहीं इसे भी आयुर्वेद के मनीषियों ने स्पष्ट किया है:
ग्रीष्मे वायुचयादानरौक्ष्यरात्र्यल्प भावतः।
दिवास्वप्नौहितो s न्यस्मिन कफपित्त करौ हि सः।।
सन्दर्भ: अ.स.सू.9/45
ग्रीष्म ऋतु में वायु का संचय होता है और आदानकाल होने के कारण शरीर में स्वाभाविक रूप से रुक्षता उत्पन्न होती है अतः दिन में सोना ठीक है, जबकि अन्य ऋतुओं में यह कफ एवं पित्त दोष को बढाने का काम करता है।
(क्रमशः…..)
*उपरोक्त तथ्य आयुर्वेद के सन्दर्भ ग्रन्थ अष्टांगसंग्रह (वाग्भट) से सन्दर्भ सूत्र सहित लिये गये हैं, जिनका उद्देश्य सामान्य व्यक्ति तक आयुर्वेद को पहुंचाना है

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